Friday, 21 August 2015

युगान्धर भूमि - अध्याय 1

युगान्धर-भूमि
ग्रहण की दस्तक



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This book or any portion thereof may not be reproduced or used in any manner whatsoever without permission except for the use of brief quotations in a book review. This book is a work of fiction. The characters and events portrayed in this book are fictitious. Any similarity to real persons, living or dead is coincidental and not intentional by the authors.



युगांधर-भूमि

जहाँ पाप है वहाँ पुण्य हैजहाँ अंधेरा है वहाँ उजाला हैझूठ है तो सच है और धर्म है तो अधर्म है। कोई भी अवस्था एक दूसरे के बिना पूर्ण नहीं हो सकतीअथवा कुछ भी निरर्थक नहीं होता है। जहाँ एक पहलू बुरा है तो उसका दूसरा पहलू सुखद है। जब से मानव ने इस धरती पर जन्म लिया है तब से अच्छाई और बुराई उसके साथ चल रही हैकभी अच्छाई का पलड़ा भारी होता है तो कभी बुराई मनुष्य पर हावी हो जाती है। अगर प्रेमत्याग और समर्पण अच्छाई की सबसे बड़ी ताकत है तो वहीं बुराई के पास क्रोधईर्ष्या और अहंकार उसके सबसे घातक हथियार हैं।
इतिहास ने समय-समय पर इस बात के प्रमाण दिए हैं कि इन दोनों के संतुलन में ही जीवन को आश्रय मिलता है और जब यह संतुलन बिगड़ता है तो केवल विनाश होता है। अपने स्वार्थ प्राप्ति के लिए जहाँ अधर्मी लोग बुरी अथवा शैतानी शक्तियों के सहारे जीवन के इस संतुलन को बिगाड़ने के लिए हर संभव प्रयत्न करते हैं वहीं इस संतुलन को कायम रखने के लिए भी कुछ लोग निरंतर प्रयासरत रहते हैं। जो अच्छाई की मशाल को थामे हुए बुराई को मिटाने का संकल्प लेते हैं। मानव जाति के विशाल परंतु भूले बिसरे अतीत में ऐसी महान आत्माओं के नाम कहीं-कहीं दर्ज हैं और कहीं ये बिल्कुल लापता हैं। कौन थे ये लोगसमय-समय पर इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है। कभी इन्हें रक्षक कहा गया तो कभी संहारककुछ लोगों ने इन्हें अवतार नाम दिया तो कुछ लोगों ने इन्हें योद्धा कहकर पुकारा। यह बस कुछ नाम हैं उन नामों में से जो उन्हें अलग-अलग युगों में मिलते रहे हैं, परन्तु जब-जब इनके जीवन के कठिन संघर्ष की गाथा को सुनाया जाएगाइनके अदम्य साहस और पराक्रम को याद किया जाएगा तो इन्हें क्या कहकर पुकारा जाएगा?
युगांधर,” हाँ, यह इन युग पुरुषों के लिए सार्थक नाम हैक्योंकि ना केवल इतिहास बल्कि आज और आने वाले युग भी इनके ऋणी होंगे। एक समय में इन्होंने हमारे वर्तमान को अपने त्यागबलिदान और निस्वार्थ समर्पण से सिंचा था। ऐसे योद्धाओं को युगांधर कहना ही शायद उनका सच्चा सम्मान होगा। यह गाथा भी इन्हीं लोगों की है जो हम मनुष्यों के अस्तित्व को कायम रखने के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करतेजिनके लिए दूसरों के दर्द और पीड़ा का मोल कहीं अधिक होता है और इसमें उनका कहीं कोई स्वार्थ भी छिपा नहीं होता है। सत्य की रक्षा करते हुए जाने कितने युगांधर मृत्यु को भेंट चढ़ गये परंतु संसार इनके बलिदान को प्रायः भूल जाता है।


अध्याय 1

आबादी से बहुत दूर और घने जंगलों के पार हरे-हरे मैदानों से कुछ उँचाई पर एक आश्रमतापिश्रम। तापी नदी के उद्गम के पास होने से इसको यह नाम मिला है जहाँ गुरु शौर्य अपने शिष्यों को कई वर्षों से शिक्षा दे रहें है। इनके शिष्य हैं मेघविधुतप्रतापदुष्यंत और वेग। परन्तु ये कोई साधारण शिक्षा ग्रहण करने के लिए गुरु शौर्य के पास नहीं हैंइन सभी ने अपना जीवन एक विशेष उद्देश्य को समर्पित किया है। आने वाले समय में मानव धर्म की रक्षा का भार इन्हीं के कंधों पर होगा और तब ये कहलाएंगे धर्मरक्षक।
गुरु शौर्य ने अगली पीढ़ी के धर्मरक्षकों के रूप में इन पाँचों का चुनाव किया है और ये सभी उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने में सफल भी हुए हैं। धर्मरक्षक होना क्योंकि अपने आप में एक बहुत बड़ा दायित्व हैइसके लिए हर योद्धा को बहुत सी कठिन परीक्षाओं से गुजरना होता है। तपस्वी की भाँति तप करना होता है और इन सभी को यह सिद्ध करना होता है कि वे हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य पथ को पूरी निष्ठा से समर्पित रहेंगे। शौर्य के मार्गदर्शन में इनकी शिक्षा का हर पड़ाव कठिन से कठिन अभ्यास से होकर गुजरा है और उसी के द्वारा इन्होंने सृष्टि के मूल तत्वों से सही तालमेल करना भी सीखा है।
इन पाँचों की दुनिया यहीं तक सीमित है। जब तक कि इनकी शिक्षा पूरी नहीं हो जाती हैइनका घर और इनका परिवार सब कुछ यहीं है। पूरा जंगल इनका घरइनका अभ्यास क्षेत्र और साथ में यही इनके लिए खेल का मैदान भी है। अभ्यास के साथ पूरी श्रद्धा और मित्रों के साथ उनकी मित्रता का भरपूर आनंद लेते हैं ये सब। बाहरी दुनिया से यहाँ का संपर्क बहुत ही कम होता है परंतु गुरु शौर्य इनको बाहर की दुनिया के संपर्क में प्रायः ले जाते हैं क्योंकि यह भी इनकी शिक्षा का हिस्सा है। धर्मरक्षक होने के लिए केवल बलवान और बुद्धिवान होना ही पर्याप्त नहीं हैउनका सामाजिक होना भी उतना ही आवश्यक है। भविष्य में क्योंकि इनको समाज में उपस्थित रहते हुए ही अपने कर्तव्य को निभाना है और इस मन्त्र से यह शिक्षा किसी को भारी भी नहीं लगती है। यहाँ अच्छाई के लिए पाँच नये स्तंभ तैयार हो चुके थे तो वहीं दूसरी ओर बुराई भी अपने लिए रास्ते खोज रही थी।
*
आश्रम से बहुत दूर उदिस्ठा की राजधानी सूर्यनगरी, रात के इस पहर में लगभग सोई हुई थी परन्तु उसकी सीमा पर अभी भी कुछ गतिविधि थी जो गश्ती सिपाहियों की नहीं लग रही थी। रात के अंधेरे में नगर से थोड़ा बाहर वह व्यक्ति बहुत ही व्याकुल हो किसी की प्रतीक्षा कर रहा था। सन्नाटे में कुछ झींगुरों का शोर केवल गूँज रहा थारोशनी अधिक नहीं थी फिर भी तारो की झिलमिलाहट में उस व्यक्ति के काले आवरण के भीतर से राजसी वेशभूषा दिखाई दे रही थी जिससे यह तो स्पष्ट था कि उसका यहाँ अकेले खड़े होना कुछ असामान्य था। उसकी आँखें किसी को ढूँढ रही थी, साथ ही साथ वह अपने चारों और देख कर इस बात की तसल्ली भी कर रहा था कि कोई उसे देख ना रहा हो।
उसके चेहरे पर झल्लाहट बढ़ती जा रही थी कि तभी उसे कुछ दूरी पर एक परछाई अपने समीप आती हुई दिखाई दी। उसने अपने आप को एक वृक्ष की ओट में कर लिया और उस परछाई को छुपकर पहचानने का प्रयत्न करने लगा। काले वस्त्र ओढ़े हुए वह आगंतुक अब बहुत निकट आ चुका थायह वही था जिस की प्रतीक्षा वह राजसी वेशभूषा वाला व्यक्ति कर रहा था। थोड़ा क्रोधित होकर वह उसके सामने आ गया।
क्या तुम्हें तनिक भी अहसास है कि मेरा यहाँ इस समय आना कितना हानिकारक हो सकता हैमेरे लिएतुम्हारे लिए और साथ में तुम्हारे उद्देश्य के लिए भी।” राजसी वेशभूषा वाला वह व्यक्ति क्रोधित हो रहा था। तुम्हें अपनी चिंता नहीं है शायद परन्तु मुझे अपने लिए इस प्रकार के जोखिम उठाना बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं।
अभी इस प्रकार चिल्ला कर क्या तुम अपने लिए संकट नहीं बुला रहे हो अवंतीशांत हो जाओअकारण मुझे भी जोखिम से खेलना पसंद नहीं है।” उस आने वाले व्यक्ति की बात से अवंती को अहसास हुआ कि वास्तव में उसका स्वर क्रोध के कारण ऊँचा हो गया थावह थोड़ा झेंप सा गया।
तुम्हारे लिए जो मैं कर सकता था वह मैंने कर दिया है भुजंगआगे का काम अब तुम संभालो। इस प्रकार बार-बार मिलने के लिए बुलाकर क्यों जोखिम को निमंत्रण दे रहे हो?” अवंती आने वाले व्यक्ति पर क्रोधित हो रहा था।
तुम्हारा काम अभी अधूरा है अवंती,” उस व्यक्ति को भी अवंती की बात पर थोड़ा क्रोध आ गया था। किस उद्देश्य की बात कर रहे थे तुम अभीक्या इसमें तुम्हारा स्वार्थ नहींयह मत भूलो कि तुम मेरे या किसी और के लिए यह संकट मोल नहीं ले रहे हो। अगर तुम्हें कुछ प्राप्त करना है तो थोड़ा तो जोखिम तुम्हें भी उठाना होगा।
परन्तु क्यों भुजंगअब जब मैंने वहाँ तुम्हारे प्रवेश की व्यवस्था कर दी है जहाँ तुम्हारे मालिक को बंदी बना कर रखा हैइसके बाद तुम्हें अब मुझसे क्या चाहिएकिस बात की प्रतीक्षा है अब तुम्हेंजैसा कि तुमने कहा था एक बार वहाँ प्रवेश मिलने के बाद भीषण को मुक्त तुम स्वयं करवा लोगे। मेरा काम हुआ फिर व्यर्थ ही मुझे बार-बार संकट में क्यों डाल रहे हो?” अवंती अभी भी नाराजगी से पूछ रहा था।
तुम्हारा काम अभी समाप्त नहीं हुआ है। उस बंदीगृह के अंदर के सुरक्षा घेरे को तो मैं तोड़ सकता हूँ परन्तु वह तिलिस्म जिसके अंदर मालिक को बंदी बना कर डाला गया हैउसका तोड़ क्या है?” भुजंग भी आवेश में आ गया थावह अवंती के समीप आने लगा। तुमने मुझे ऐसा कुछ पहले क्यों नहीं बताया?”
ओ...ओ... देखो वह हमारी बात का हिस्सा नहीं था।” अवंती पीछे हटते हुए बोला।” मेरा काम केवल तुम्हें रास्ता दिखाने का थारही बात वह तिलिस्म तो मुझे लगा यह तुम्हारे लिए कोई जटिल विषय नहीं होगा।
वह तिलिस्म हैकोई बच्चों का खिलौना नहीं है जिसे कोई भी आसानी से तोड़ सके। मुझे सब बताओ उस तिलिस्म के बारे में क्योंकि बिना कुछ जाने हमला करने का अर्थ है सीधे मृत्यु को गले लगाना।” भुजंग ने अवंती को गले से पकड़ लिया था।
देखो मेरी बात सुनोमैं कुछ नहीं जानता इस बारे में। मैं सच कह रहा हूँ मुझे भी बस इतना मालूम है कि भीषण किसी काले जादू या शायद तिलिस्मी घेरे में बंद है परन्तु वह तिलिस्म क्या हैकिसने बनाया है और कैसे बनाया हैइसके बारे मैं कुछ नहीं जानता। इस विषय में मैं तुम्हारी कुछ भी सहायता नहीं कर सकता हूँ।
“तुम सूर्यनगरी के इतने बड़े मंत्री हो और तुम कह रहे हो कि तुम्हें कुछ नहीं पता।” भुजंग ने अपनी पकड़ ढीली कर दी। अगर तुम नहीं जानते तो फिर कौन जानता है?”
देखो यही सच है। भले ही मैं इस राष्ट्र का महामंत्री हूँ परंतु मैं सच कह रहा हूँभीषण के कारावास के बारे में हर बात गुप्त रखी गई है।” अवंती ने अपनी विवशता बताई।
अगर तुम नहीं तो फिर कौन जानता है उस तिलिस्म के बारे में?” अवंती की बात ने भुजंग को विचलित कर दिया था। उस तिलिस्म को कैसे तोड़ा जा सकता है यह कोई तो जानता होगा...
यह तिलिस्म धर्मरक्षकों की निगरानी में बनाया गया था और उनके अलावा राजा बाहुबल ही केवल इस बारे में जानते हैं। अगर तुम चाहो तो उनसे यह रहस्य जानने का प्रयत्न कर सकते हो।” अवंती ने कहा।
तुम अच्छी प्रकार से जानते हो कि उनसे यह जानकारी हासिल करना असंभव है।” भुजंग उसके पास आकर बोलाउसकी आँखें क्रोध से लाल थी। मैं अपने लक्ष्य के इतने निकट होकर और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मुझे उस तिलिस्म का तोड़ हर हाल में चाहिए और जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता हूँ मैं तुम्हें भी चैन से नहीं बैठने दूंगा।
जब तुम यह जानते हो कि उनसे यह जानना असंभव है फिर मुझसे तुम इस प्रकार की आशा कैसे कर सकते हो?” अवंती भी नाराजगी से बोला। जितना मुझसे बन सकता था वो मैंने तुम्हारे लिए किया हैअब इससे आगे मैं विवश हूँ।
तो क्या यही अंत है हमारे प्रयासों कानहींमैं कदाचित हार नहीं मान सकता।
मेरा यह अर्थ बिल्कुल नहीं था।
एक बात सुन लो अवंतीअपने लक्ष्य के इतने समीप आकर अब मुझे पराजय स्वीकार नहीं। अगर ऐसा हुआ तो मैं तुम्हें...
जरा रुको… हाँ… एक तरीका है,” तभी अवंती को कुछ याद आयाउसकी आँखों में चमक आ गई थी। हाँ एक रास्ता है सब कुछ पता लगाने कावह स्त्रीहाँ वो स्त्री अवश्य हमें कुछ बता सकती है।
कौन स्त्रीजल्दी बताओ मुझे।” भुजंग को भी कुछ आशा दिखी।
“जरा ठहरोतुम कुछ पूछो उससे पहले मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूँ कि उसका नाम क्या है और वो कहाँ रहती हैयह मैं नहीं जानतायह तुम्हें स्वयं ही पता लगाना होगा।
तुम जो जानते हो वह बताओ पहले।
देखो एक स्त्री मुझे याद हैजिस दौरान भीषण को कारावास में डाला गया था वह भी थी वहाँ। कोई और नहीं परन्तु वह थी… मुझे विश्वास है वह अवश्य कुछ जानती होगी इस बारे में।
और क्या जानते होबोलो जल्दी।
मैंने बताया ना कि मैं विशेष कुछ नहीं जानता इस बारे मेंहाँ वह आकर्षक थी और थोड़ी विचित्र भी थीइसके अलावा…” अवंती मौन हो गया इतना कहकर।
वाहबहुत- बहुत धन्यवाद तुम्हारी इस सहायता के लिए। तुम कह रहे हो कि मैं किसी दीये के सहारे पूरे संसार में एक स्त्री को खोजूँ जिसका कि मैं नाम तक भी नहीं जानता।
भुजंग, तुम भी कुछ करोमैं भी प्रयास करता रहूँगा।
तुम्हारी यह आधी अधूरी जानकारी…” भुजंग ने चिड़ कर कहा। राजा बाहुबल के मंत्री होकर भी आज तक कुछ नहीं जान पाए तुम। मैं पता लगाने का प्रयास करता हूँ परन्तु तुम आराम से मत बैठनाकुछ भी जानकारी हासिल हो मुझे सूचना कर देना।” अवंती ने हाँ में सर हिलाया।
 राजा बाहुबल के नाई बन जाओ तो शायद मेरे कुछ काम आ सको।” यह कहकर भुजंग फिर से उसी अंधेरे में गुम हो गया जहाँ से निकल कर वो आया था, पीछे खड़ा अवंती उसे जाता हुआ देख रहा था और शायद उसके अंतिम वाक्य के बारे में सोच रहा था। अचानक उसे याद आया कि वो अभी तक वहीं खड़ा है, उसने इधर उधर एक क्षण के लिए देखा और फिर अपने रास्ते की और बढ़ चला

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (14-09-2015) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2098) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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