Thursday, 20 August 2015

युगान्धर भूमि - अध्याय 10

युगान्धर-भूमि
ग्रहण की दस्तक



अध्याय 10


उदिस्ठा की राजधानी सूर्यनगरी. जैसा योद्धाओं ने सोचा था, उनको बुलाने का कारण चुड़ैलें ही थी।
बहुत कठिन दौर से गुजर रहे हैं महायोद्धा शौर्य हम। कुछ समय से तो यह बिल्कुल ही नियंत्रण से बाहर हो गया है।”
आपको हमें पहले ही सूचना दे देनी चाहिए थी महाराज बाहुबलहमने देखा था रास्ते में लोग किस प्रकार भय के साये में जी रहे हैं।” शौर्य बोले।
हमें लगा था हम इसे संभाल सकते हैं परंतु हम गलत थे। नहीं मालूम था कि यह बहुत गंभीर है।”
क्षमा कीजिए परंतु आप जैसे राष्ट्र के लिएजिसकी ख्याति है दूर-दूर तक… यह चुड़ैलें इतना बड़ा संकट दिखाई नहीं देती।” देव ने कहा।
यही भ्रम हमें भी था योद्धा, जिसका परिणाम हमारे सामने है।”
आपने उनको रोकने के लिए क्या किया है अब तक?” देव ने ही दुबारा पूछा।
“हमने तो हमारी ओर से हर संभव प्रयास करके देख लिया है, इसमें भी हानि हमें ही उतनी पड़ रही है।”
“सेना का उपयोग?” प्रताप ने जानना चाहा।
“सामना कहीं खुले मैदान में हो तो सेना अवश्य कुछ कर सकती हैपरंतु... विधारा के उन घने जंगलों में सेना का उपयोग करना अपने ही सिपाहियों के प्राणों को संकट में डालने के जैसा है
क्या आपने यह प्रयास किया है पहले?” शौर्य ने पूछा।
हाँ, सर्वप्रथम यही किया था, एक दो को मार भी दिया तो क्यावो बदले में हमारे सैकड़ों सिपाहियों को मौत के घाट उतार देती हैं। अब तक हमारे कई सैनिकों को निगल चुका है वो भयानक जंगल। उस जंगल में कोई नहीं पहुँच सका है आज तक। जान बुझ कर हम कब तक अपने सिपाहियों को यूँ मौत के मुंह में धकेलें…? और सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि हमारी ऐसी किसी कार्यवाही के बाद आम जन पर चुड़ैलों के हमले बढ़ जाते हैं।” बाहुबल कहे जा रहे थे। “अब हर गाँव और नगर में तो सेना को नहीं बैठाया जा सकता है ना। लोगों का भरोसा हम पर से समाप्त हो रहा है। विधारा की सीमा वाले क्षेत्रों में सैनिकों की गश्त बढ़ा दी है परंतु यह कोई समाधान नहीं है।?
और बाकी देशउनकी क्या रणनीति है?” विराट ने पूछा
उनकी रणनीति भी किसी के हित में नहीं है। इथारकम्पीलिया और त्रिपाला राष्ट्र ने तो आक्रमण की तैयारी कर ली है और हमसे भी वो इसमें सहयोग की मांग कर रहे हैं। मीलों तक फैला विधारा और उसके अंदर कहाँ छुपी हैं ये चुड़ैलें? हमें कुछ नहीं पता और चुड़ैलें तो विधारा के जंगल के हर कोने से भली भाँति परिचित हैं। जैसा पहले भी हो चुका है सेना की टुकड़ियाँ जंगल में प्रवेश करने का प्रयास करेंगी और वहीं से उनके रक्त की नदियाँ बहनी प्रारम्भ हो जाएँगी। संख्या में हम उनसे भले ही अधिक हों परंतु जब तक शत्रु दिखाई ना दे हमारे सिपाही क्या कर सकते हैं?”
“आपने कहा कि कुछ समय से इनका आतंक बढ़ गया है, अर्थात पहले ऐसा नहीं था?” शौर्य ने प्रश्न किया
नहीं ऐसा नहीं है कि पहले ये कुछ भी नहीं करती थी। कभी कभार इनके हमले होते थे और हमने भी तब कई चुड़ैलों को समाप्त किया था। उस समय शायद इन चुड़ैलों में भी कहीं ना कहीं हमारा भय था परंतु अब तो जैसे उन्हें किसी बात का डर नहीं रहा।”
कोई तो कारण होगा महाराज, जो ये इस प्रकार से मनुष्यों की शत्रु बन गई।”
“यह जाति तो मनुष्यों की शत्रु सदा से ही हैं योद्धा, अब बस इन्होने अपना वास्तविक रंग दिखना आरंभ कर दिया है।” बाहुबल कुछ देर चुप हो गये फिर आगे कहा। “आस पास के देशों की यह एक एकल समस्या है। जो जंगलों पर आश्रित थे, उन कई सहस्त्र लोगों के तो व्यवसाय बंद हो चुके हैं। लोग घर, गाँव छोड़कर नगरों में आने को विवश हो रहे हैं। हमहम त्रस्त हो चुके हैं इन चुड़ैलों सेजाने कहाँ से निकल के आती हैं और लोगों को अपना शिकार बना के फिर कहीं छुप जाती हैं। फिर इनको ढूंढ़ना भी तो आसान नहीं है, हमारे बीच में होते हुए भी हम उन्हें पहचान नहीं पाते हैं।” बाहुबल की बातों से उनकी पीड़ा झलक रही थी
“वो कहते हैं कि कोई दूसरा मार्ग नहीं है। मैं जानता हूँ कि एक जुट होकर सेना का प्रयोग करने से हम उन्हें शायद पराजित भी सकते हैं परंतु इसमें हमारी सेना को कितनी बड़ी हानि उठानी होगी? इस बात की सभी उपेक्षा कर रहे है। उन सिपाहियों के परिवारउनके बच्चों का क्या होगा जो लौट नहीं पाएंगे उस भयानक जंगल से? इन राष्ट्रों को यह दिखाई नहीं दे रहा है। इन चुड़ैलों को हम भी समाप्त कर देना चाहते हैं परंतु इस मूल्य पर…” थोड़ी देर चुप रहकर बाहुबल ने फिर गंभीरता से कहा। “बहुत कम समय है हम लोगों के पास क्योंकि वो शीघ्र ही आक्रमण करने वाले हैं और मैं… मैं ना तो मना करने की स्थिति में हूँ और ना ही उनका साथ देने की स्थिति में। मैं नहीं जानता कैसे? परंतु केवल आप लोग ही अब कुछ कर सकते हैं। इस त्रासदी को होने से रोक लीजिए महायोद्धा, रक्षा कीजिए हमारे निर्दोष लोगों के प्राणो की ।”
“महाराज, आप अब निश्चिंत रहिए हम लोग आ गये हैंइसका हल अवश्य ढूँढ लेंगे।” शौर्य ने बाहुबल को आश्वासन दिया।
“अब बस आपसे ही आशा थी इसीलिए आपको संदेश भेजा।”
“आप सर्वप्रथम तो सभी देशों से हमारी एक भेंट का प्रबंध कीजिए।” कुछ विचार करके शौर्य ने कहा।
“हम सब भोर में ही इथार के लिए निकल सकते हैं। इथार नरेश महाराज विधान को मैंने आप लोगों के आने तक बस रोक के रखा था।”
बाहुबल से मुलाकात के कुछ समय के बाद
उन्हें कह तो दिया है परंतु क्या यह इतना आसान होगा शौर्य?”
अब जो भी होवैसे भी हम आसान काम करते ही कहाँ हैं।” विराट के प्रश्न का जवाब यूँ दिया था शौर्य ने
परंतु इनसे लड़ना कुछ अधिक ही जटिल होने वाला हैउन पाँच छः चुड़ैलों से लड़ना मुझे कितना भारी पड़ा थाये मैं ही जानता हूँ। बहुत शक्तिशाली हैं ये चुड़ैलें।”
अब कुछ भी हो इन्हें रोकना तो आवश्यक है।”
तो अब सबसे पहले हम क्या करें?” तेजस ने पूछा।
बाकी देशों को रोकने और इस आतंक के प्रारम्भ होने का कारण जानने का प्रयास।”
*
शीघ्र ही बाहुबल सभी योद्धाओं को लेकर ईथार पहुँच गये थे, राजा विधान के अलावा कम्पीलिया के राजा भूमिंजया और ईथार राष्ट्र के कुछ प्रतिनिधि इस समय वहाँ मौजूद थे। सर्वसम्मति से विधान को अब कोई निर्णय लेना था और इसी के पक्ष-विपक्ष में वहाँ बहस हो रही थी।
महाराज बाहुबल, हमें इनकी वीरता पर कोई संदेह नहीं है परंतु ये बस पाँच हैं… ये कैसे उनका सामना कर पाएंगे?” इथार नरेश विधान ने अपना अविश्वास प्रकट किया
यह कोई विकल्प नहीं है महाराज, बिना विलंब किए हमें अब जल्द ही आक्रमण कर देना चाहिए।” कम्पीलिया के राजा भूमिंजया का भी मत यही था
हाँ और अब तो धर्मयोद्धा भी हमारे साथ हैं। महाराज बाहुबल, उन्हें उनके बिल से निकाल कर मारना इतना कठिन नहीं है जितना आप समझ रहे हैं।” राजा विधान बोले
महाराज, जंगल के भीतर कहाँ से और कैसे घुसना हैअभी तक यह तो निश्चित नहीं हुआ है और आप उन्हें उनके बिल से निकालने की बात कर रहे हैं। स्मरण है ना पिछली बार क्या हुआ था।” बाहुबल ने कहा।
“इस बार वैसा नहीं होगा महाराज बाहुबल, भरोसा रखिए।” विधान ने कहा तो बाहुबल ने प्रश्न भरी आँखों से उसे देखा। “हाँ, क्योंकि हम जंगल का रास्ता चुनेंगे ही नहीं जहाँ वो हम पर छुप कर हमला कर सकें।”
तो फिर?”
हम समुद्र के रास्ते से हमला करेंगे।”
यह सरासर मूर्खता होगीहमारे पास ना तो इतने जहाज हैं और ना ही उनके ठिकाने की ठीक से कोई जानकारी और फिर हमने बस सुना है कि उनका ठिकाना पश्चिम में समुद्र तट पर हैइस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं हमारे पास।” बाहुबल भी अपनी बात पर बल देकर कह रहे थे
उनका ठिकाना समुद्र तट पर ही हैइस बात का प्रमाण बहुत से मछुआरों ने दिया है।” राजा भूमिंजया ने विश्वास भरे शब्दों में कहा था
और वहाँ तक पहुँचेंगे कैसेऊदिस्ठा के पास कुल अठारह युद्धक पोत हैं, माल वाहक जहाज भी मिला लिए जाएँ तो भी तीस से अधिक नहीं हैं।” यह कहकर बाहुबल भूमिंजया को देखने लगे। “और उदिस्ठा के अलावा केवल आपके पास ही कुछ युद्धक पोत हैं, अगर मैं ठीक हूँ तो कुछ दस या बारह है। अधिकाधिक पाँच-छः हज़ार सैनिकों को ले जाया जा सकता है, हम हमारी सेना को पहुँचाएंगे कैसे वहाँ तक?”
हमारी रणनीति के लिए इतने पर्याप्त हैं महाराज, और अगर कम भी पड़े तो आप त्रिशला महाराज उद्धवराग से उनके जहाज ले सकते हैंवो आपको मना नहीं करेंगे।” भूमिंजया ने कहा।
“रणनीति! क्या रणनीति है आपकी?” शौर्य ने जानना चाहा
हम हमारी जितनी सेना को भेज सकेंगे समुद्र के रास्ते से भेजेंगे। मगर लड़ने के लिए नहींचुड़ैलों को केवल उलझाकर रखने के लिए।” बाहुबल के साथ सभी योद्धा भी उसकी युक्ति को ध्यान से सुन रहे थे। “हाँ उलझा कर रखने के लिए ताकि हमारी बाकी की सेना जंगल में रास्ता बना कर आगे बढ़ सके और एक बार हम वहाँ तक पहुँच गये तो… मुझे क्या अब आगे बताना पड़ेगा?”
विधारा का पश्चिमी तट चट्टानों से अटा पड़ा हैसेना को किनारे उतारने का काम आसान नहीं होगा। और अगर किनारे पर पहुँचने से पहले चुड़ैलों को इसकी सूचना हो गई तो फिर यह बहुत प्राणघातक भी हो सकता है।” बाहुबल कहीं भी संतुष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे
महाराज, युद्ध में बलिदान देने पड़ते हैं, युद्ध में हर सिपाही जीवित लौट के आए यह संभव नहीं है।” भूमिंजया के इस विचार से बाहुबल के साथ योद्धा भी परेशान दिख रहे थे
महाराज बाहुबलराजा भूमिंजया सही कह रहे हैं। यह बलिदान तो देना ही होगा, इसके अलावा और कोई रास्ता भी हमारे पास नहीं है।”
“आपकी रणनीति बुरी नहीं है महाराज विधान,” इस बार विराट ने कहा। “परंतु इसके बाद भी यह तो निश्चित है कि इस युद्ध का दंश आपको भी झेलना होगा। दूसरी बात, इस अभियान के सफल होने के आसार इतने अधिक भी नहीं दिख रहे है क्योंकि यह केवल अनुमान पर आधारित है।”
तो क्या आप लोगों के पास इससे अच्छा सुझाव है?” राजा भूमिंजया ने तैश में आकर पूछा
विराट सोच में पड़ गया। “हमें थोड़ा समय चाहिए।”
हमारे लोग मर रहे हैंसमय हमारे पास अब बिल्कुल भी नहीं है। और फिर उन अनगिनत शैतानों के आगे आप थोड़े समय में कर भी क्या सकते हैं?”
अधिक नहीं बस हमें एक-दो सप्ताह का समय दीजिए, हम इनके आतंक को रोकने का कोई ना कोई रास्ता अवश्य ढूंढ़ लेंगे, जिसमें हमारी अधिक हानि ना हो।” शौर्य ने कहा
नहीं योद्धाओंइतना समय हम नहीं दे सकतेकहीं हमारी रणनीति की भनक उन तक पहुँच गई तो हमारी सारी तैयारी व्यर्थ हो जाएगी। पाँच दिन… बस इससे अधिक नहींउसके बाद हम हमला करेंगे।”
शौर्य ने अपने बाकी साथियों की ओर देखासमझाने का कोई प्रभाव नहीं था यहाँ। “तो फिर ठीक है, हमारे लिए पाँच दिन पर्याप्त हैं। महाराज विधान, हमें आपके कुछ चालक एवं अनुभवी सैनिकों की आवश्यकता है। हमें अपना काम शीघ्र ही प्रारम्भ करना होगा।” शौर्य ने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया थासभी उसकी दृढ़ता को देख उसकी मंशा समझने का प्रयास कर रहे थे। यही हाल बाकी के योद्धाओं का भी था
सभा के समाप्त होने के बाद। “शौर्य, यह बहुत कम समय है, पाँच दिन में हम भला क्या कर सकते हैं?” तेजस परेशानी से बोला। “हमें कुछ पता नहीं कि कहाँ से और क्या शुरुआत करनी है?”
वो भी तो हठ पर अड़े हुए हैंअब हमें कुछ तो करना ही होगा।”
परंतु क्याकुछ सोचा भी है तुमने?”
सबसे पहले तो यह जानना है कि चुड़ैलें यह क्यों कर रही हैं?”
यह तो वह चुड़ैल बता ही चुकी हैमनुष्यों को विधारा से पीछे खदेड़ना ही उनका लक्ष्य है।” विराट ने कहा
परंतु अचानक यह सब क्यों प्रारम्भ हो गया?”
कुछ देर की शांति के बाद। “तुम्हारी क्या युक्ति हैतुम वह बताओ ना पहले।” तेजस ने पूछा
वही सबसे कारगर उपाय, पेड़ को गिराना है तो उसकी जड़ पर प्रहार करना होगा।” शौर्य ने सब की ओर देखते हुए कहा। “क्या नाम बताया था उस चुड़ैल ने… हाँ अजराकिसी भी प्रकार से हमें बस अजरा तक पहुँचना हैसीधी प्रकार से अगर वह बात समझेगी तो ठीक अन्यथा किसी और प्रकार से उसे समझाएंगे।”
वाह शौर्य, बहुत बढ़ियावहाँ वो सब इतनी बड़ी सेना होते हुए भी अजरा तक पहुँचना एक चुनौती समझ रहे हैं और तुम कुछ मुट्ठी भर सिपाहियों के साथ…” अंगद ने आश्चर्य से कहा
हाँ सोचा तो कुछ ऐसा ही है।”
तभी इथार का वह अधिकारी हांफते हुए वहाँ पहुँचा। “महायोद्धा शौर्यवहाँ… वहाँ खानपुरा में कोई आठ दस चुड़ैलें देखी गई हैं।” वह रुक के साँस लेने लगा। “मुझे लगा आप इस अवसर का कोई सही उपयोग कर सकते हैं।”
कितना दूर है यह खानपुरा?”
“कोई आठ मिल दूर है यहाँ से।”
धन्यवाद मित्र।”
ऐसा ना कहिए महायोद्धायह युद्ध ना हो मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना हैसैनिक तो मेरे ही मारे जाएंगे। अब तक बहुत सिपाही खो चुका हूँ।”
अब और नहीं सेनापति विश्वजीत।” शौर्य ने कहा
देर किस बात कीचलो दबोचते हैं उन चुड़ैलों को।” देव ने कहा
नहींवहाँ केवल मैं जाऊँगा, तुम्हें कुछ और करना है।” शौर्य यह कहकर विश्वजीत की ओर घुमा। “सेनापति, जैसे कि हमने मांग की थी आप तुरंत अपने सिपाहियों की तीन टुकड़ियाँ तैयार कीजिए।”
जी महायोद्धा।” थोड़ा रुक के उसने फिर कहा। “महायोद्धा, क्या मैं आपके कुछ काम आ सकता हूँ?”
शौर्य ने उसे एक क्षण देखा और… “ठीक है सेनापति विश्वजीतआप मेरे साथ चलेंगे। अब तुम सब मेरी युक्ति ध्यान से सुनो...End of the Chapter 10/55

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अध्याय 14 से...
अब तक सारी घटनाएँ क्षिराज को भी पता चल चुकी थीआमलिका में वह भुजंग पर बरस रहा था
तुमने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा भुजंगधर्मरक्षकों को बस एक अवसर चाहिए था और वह उनको तुम्हारे कारण मिल गया है।” क्षिराज के स्वर में झुंझलाहट के साथ क्रोध भी था। “तुम्हारा काम तो अधूरा का अधूरा ही रहा परंतु मेरे लिए तुमने खाई खोद दी है। अब नवराष्ट्रों के सामने मैं क्या जवाब दूंगा?”
“उसकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्षिराज।” भुजंग ने कुछ कहना चाहा
“आवश्यकता पड़ेगी नहीं, पड़ चुकी है। अब किसी भी समय मेरे पास उनका बुलावा आने वाला हैमुझे जाना भी होगा और जवाब भी देना होगा। मुझे सभी देशों के सामने स्पष्टीकरण देना होगा। क्या कहूँगा मैं वहाँ?”
“तुम्हें कुछ कहने की आवश्यकता नहीं होगी, मुझपर भरोसा रखो।” भुजंग ने फिर कुछ कहना चाहा परंतु
अब तक वही तो किया थामुझे क्या मालूम था कि तुम मेरे लिए इतना बड़ा संकट खड़ा कर दोगे। धर्मरक्षकों को संदेह हो चुका है और अब उनसे इस सच को छुपा के रखना असंभव है। आज नहीं तो कल वो जान जाएंगे कि हमारा उद्देश्य क्या था और उसके बाद…”
ओह... तो यह डर जो तुम्हारे चेहरे पर दिखाई दे रहा हैइसका असली कारण धर्मरक्षक हैं।” क्षिराज के डर को ताड़ कर भुजंग ने कहा। “तुम धर्मरक्षकों से इतना डरते क्यों हो? तुम इथार के राजा होइस प्रकार डरना तुम्हें शोभा नहीं देता। वो भी इतनी शक्ति और सामर्थ्य के होते हुएक्या बिगाड़ सकते हैं वो तुम्हारा?”
नहींमैं नहीं डरता धर्मरक्षकों से परंतु यहाँ पर स्थिति जब अपने विरुद्ध हो तो डरना आवश्यक हो जाता है। मत भूलो कि भीषण की तुलना में मेरी क्षमता कुछ भी नहीं हैउसका हश्र तुम्हें याद दिलाऊँगा तो तुम्हें दुख होगा। जानबूझकर संकट को गले लगाना मूर्खता कहलाती है।”
परंतु इस प्रकार घबराने से क्या संकट कम हो जाएगाउनके सच जानने से पहले ही हम अपना काम कर चुके होंगे। एक बार मालिक मुक्त हो जाएं उसके बाद तुम्हारा या मेरा कोई कुछ नहीं बिगड़ सकता है।”
अब भी तुम्हें भीषण के स्वतंत्र होने की आशा हैवह चुड़ैल तुम्हारे हाथ से निकल चुकी है जिसके सहारे तुम भीषण को बाहर निकालने के स्वप्न देख रहे थे और मेरे सैनिकों को फँसा दिया तुमने उन धर्मरक्षकों के चंगुल में।
क्षिराज, उस चुड़ैल के हमारे हाथ से निकलने में या तुम्हारे सैनिकों के फँसने में गलती मेरी नहीं थीतुम्हारे सैनिकों की लापरवाही के कारण यह सब संकट आया है।”
भुजंगमत भूलो उनकी कमान मैंने तुम्हारे हाथ में सौंपी थी। उनका कहाँ और कैसे उपयोग करना था यह तुम्हारा काम था। मेरे सैनिकों में कमी बता के तुम मेरे क्रोध को और मत बढाओ। और तुम्हारे लोगों ने कौन सा काम पूरा कर दियाकम से कम तारकेन्दु को सूर्यनगरी जाने से रोक सके होते तो भी मैं कुछ जवाब सोच लेतापरंतु …”



अध्याय 24 से...
बाहुबल अपने कक्ष से बाहर निकले तो वहाँ विक्रम उनकी पहले से प्रतीक्षा कर रहा था। बाहुबल कक्ष से बाहर निकलते ही फुर्ती से राज दरबार की और बढ़ चले और उनके साथ विक्रम भी चल दिया
सब पहुँच गये हैं?” बाहुबल अभी भी अपनी पोशाक को सही कर रहे थे, उन्होंने विक्रम से पूछा
जी महाराज सब आ गये हैं परंतु…” विक्रम कुछ कहता उससे पहले ही सामने से आते हुए शौर्य को देखकर बाहुबल थोड़ा चौंक गये
महायोद्धा, आप यहाँ कैसेक्या कुछ बात है?” बाहुबल ने विक्रम की बात को बीच में रोक कर कहा
हाँ महाराज, सभा से पहले आप को कुछ सूचित करना आवश्यक था।”
कहिए शौर्य।”
महाराज, आपको बताना चाहता हूँ कि कुछ थोड़ा सा बदलाव किया है हमने। अब इस पूरे मामले की जाँच विराट के हाथों में होगी इसलिए अब सभा को भी विराट ही संबोधित करेंगे।”
परंतु अचानक ऐसा क्यों?”
आप जानते हैं महाराज कि हमारे शिष्यों की दीक्षा का समय निकट आ गया हैमैं अपना ध्यान उस पर केंद्रित रखना चाहता हूँ। इसके अलावा कुछ और कारण भी है महाराज परंतु क्षमा चाहूँगा अभी के लिए मैं वो कारण बताने में असमर्थ हूँ।”
ठीक है शौर्य, आपने सोच समझ कर ही यह निर्णय लिया होगा। आप जैसा उचित समझें वैसा ही कीजिए।”
एक और बात भी है महाराज।”
कहिए शौर्य।”
क्योंकि अभी तक यह निश्चिंत नहीं है कि दुष्यंत ने जिस चुड़ैल को देखा था वह रूपसी ही थी या कोई औरइसलिए हम अभी रूपसी का नाम उन हत्याओं से नहीं जोड़ेंगे। “
परंतु उस चुड़ैल के साथ यह सहानुभूति क्यों योद्धा?”
महाराज, हमारा उद्देश्य केवल सच की तह तक पहुँचना है। बिना यह सिद्ध हुए कि रूपसी ही दोषी हैउसका नाम सब के सामने आने से चुडैलें शायद हमारी सहायता ना करें और हो सकता है अजरा यहाँ आने को तैयार भी ना हो।”
यह मामला आपको सुलझाना है योद्धाआप जानते हैं कि आपको क्या करना हैकोई भी तरीका अपनाइए, मुझे आप के किसी तरीके पर कोई आपत्ति नहीं है। परंतु मेरी राय हैअगर आपने यह निर्णय लिया है तो फिर इस बात का ध्यान रखिएगा कि संयुक्त राष्ट्रों को कभी भी इस बात का पता ना चलने पाए। क्योंकि यह बात उनको समझाना संभव नहीं होगा और आप धर्मरक्षकों के न्याय पर भी सवाल उठाया जा सकता है।”



अध्याय 32 से...
महाराजकबसे मेरे लोगों को चोरी से उठा के ले जा रही थी वो। आप ही बताइए क्या अब हम इतने भी स्वतंत्र नहीं हैं कि अपने लोगों की सुरक्षा के लिए कोई कदम उठा सकेंवह मेरे राज्य में शिकार का खेल खेल रही थीमेरे लोग लापता हो रहे थेअगर उसे पकड़ा तो कौनसा अपराध किया था मैंनेअब आप ही…”
एक क्षण राजकुमारलोग तो हमारे भी लापता हो रहे हैं। क्याक्या… इसका अर्थ है वो भी उसी चुड़ैल ने…” भूमिंजया ने अपना संदेह प्रकट किया
निःसंदेह महाराजयह उसी का काम है।” क्षिराज तपाक से बोला
हमने तो इसे अभी तक गंभीर नहीं लिया था।”
तो अब गंभीर हो जाइए अन्यथा धर्मयोद्धाओं की ओर से हमें तो कोई आशा दिखाई नहीं दे रही है। चुड़ैलों से जाने क्या संबंध है इनका? सदैव उनका ही हित दिखाई देता है इनको। सदा से इन्होंने मनुष्यों के विरुद्ध चुड़ैलों का ही पक्ष लिया है, आप तो जानते हैं। और आज भी देख लेना …”
ना, ना… राजकुमारइस बार नहीं। अगर इस बार योद्धाओं का तरीका न्यायसंगत नहीं हुआ तो मैं सहन नहीं करूँगाफिर चाहे कोई मेरे साथ हो या ना हो।”
नहीं महाराज, अगर वास्तव में हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो हमें सब के साथ की आवश्यकता होगी। केवल आप और मैं मिलकर कुछ नहीं कर सकतेहम सब राष्ट्रों को यहाँ एक होना पड़ेगा।”
यह तो परंतु शायद आसान नहीं होगा।” भूमिंजया बोला
अब यह होगा तो ठीक अन्यथा मैं तो अपने आप को संयुक्त राष्ट्र से अलग कर लूंगा। इन धर्मयोद्धाओं के कारण हमें बहुत क्षति हो रही है।” क्षिराज ने तिरछी आँखों से भूमिंजया को देखते हुए कहा। “आपने भी तो धर्मयोद्धाओं के कारण इतनी बड़ी क्षति उठाई है।”
मैंनेक्या अर्थ है आपका? हमें क्या क्षति हुई है?” भूमिंजया अंजान बनते हुए बोला
आपको क्या लगता है कि हम नहीं जानते? आप कहें या ना कहें परंतु इतनी जानकारी रखते हैं महाराज हम। दिरदन्ता प्रदेश को पाने का इससे सुनहरा अवसर आपके हाथ कभी नहीं आता परंतु आप कुछ ना कर सके, कारण? धर्मयोद्धा। वो आपको किसी भी मूल्य पर ऐसा नहीं करने देते। हम राजा हैं और राजनीति करना हमारा काम हैयह राजनीति इनको थोड़े समझ आएगी। दिरदन्ता का शासन कमजोर हो चला था और उसका पतन निश्चिंत थायह आप भी जानते थे। इस सुअवसर का लाभ सप्ताब नरेश श्रीश को मिल गया और आप हाथ मलते रह गये।”
छोड़िए उस बात को महाराजयाद मत दिलाइए।” भूमिंजया ने आह भरते हुए कहा
“इसीलिए तो मुझे धर्मयोद्धाओं का हर मामले में हस्तक्षेप करना पसंद नहीं है। आप बताइए संयुक्त राष्ट्रों का सदस्य होने से हमें क्या हासिल हो रहा है? बंधन सा महसूस होता है हमें तो।”


इस बार सभी इकट्ठा हुए हैं तो इस बारे में भी अवश्य बात करेंगे। आप निश्चिंत रहिए हम आपके साथ अन्याय तो नहीं होने देंगे।” भूमिंजया का साथ हासिल कर क्षिराज भीतर ही भीतर मुसकुरा रहा था

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